जब वामपंथ का गढ़ नंदीग्राम ही बन गया था बंगाल की लेफ्ट सरकार का ताबूत, जानें कैसे बदल गई सूबे की राजनीतिक तस्वीर?

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पुलकित भारद्वाज/नई दिल्ली: यदि आपसे पूछा जाए जाए कि अगले पांच राज्यों में होने वाले विधानसभा चुनावों में से सबसे ज्यादा चर्चित सीट कौनसी है? तो यकीनन आपके ज़ेहन में पश्चिम बंगाल की नंदीग्राम सीट का ही नाम उभरेगा. ऐसा इसलिए भी क्योंकि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख ममता बनर्जी वहीं से चुनाव लड़ रही हैं. इसी सीट से भारतीय जनता पार्टी ने टीएमसी के बागी शुवेंदु अधिकारी पर दांव आजमाया है. वहीं, माकपा की तरफ से मीनाक्षी मुखर्जी मैदान में हैं.

हाल ही में नंदीग्राम इसलिए भी खबरों में आ गया, क्योंकि वहां एक कथित हमले में ममता बनर्जी घायल हो गई थीं. लेकिन क्या आप जानते हैं, नंदीग्राम सिर्फ इसी चुनाव में सुर्खियां नहीं बटोर रहा है. 14 साल पहले भी इस क्षेत्र ने देश भर की मीडिया का ध्यान अपनी तरफ खींच लिया था. यही वो मौका भी था जब वामपंथ का गढ़ माने जाने वाले बंगाल से तीन दशक पुरानी लेफ्ट सरकार को उखाड़ फेंका था.

जानिए क्या था पूरा किस्सा:

2007 में, कागज पर, नंदीग्राम पश्चिम बंगाल के पूर्वी मिदनापुर जिले में 100 से अधिक गांवों में 27,000 एकड़ भूमि पर गृह युद्ध जैसी हालत के 11 महीने के लिए निकटतम पुलिस स्टेशन था. लेकिन यह प्रतीकात्मक नंदीग्राम था, जो मायने रखता था, जिसमें यह सिर्फ मरने वाले लोगों का नहीं था, बल्कि प्रगति का सपना और औद्योगीकरण का वादा भी था. वामपंथी सरकार के 30 वर्षों के राज्य शासन के दौरान उच्च पद पर आसीन मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य औद्योगिकीकरण के मिशन पर थे.

साल था 2006. पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने भारत के नामचीन व्यवसायी रतन टाटा के साथ एक समझौता किया था. इस करार के तहत रतन टाटा और इंडोनेशिया की एक रियल स्टेट कंपनी ‘सलीम ग्रुप’ बंगाल के सिंगुर में अपने महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट ‘नेनो कार’ का प्लांट स्थापित करने वाले थे. टाटा ग्रुप ने बंगाल सरकार से वायदा किया कि वह सिंगुर में नेनो प्लांट के साथ राज्य का सबसे बड़ा विशेष आर्थिक क्षेत्र (SEZ) भी विकसित करेगा. इस प्रोजेक्ट के लिए 48 हजार करोड़ रुपए निवेश किए जाने थे.

लेकिन तभी तत्कालीन विपक्षी दल टीएमसी की मुखिया ममता बनर्जी ने दिसबंर-2006 में फैक्ट्री के निर्माण के खिलाफ अनशन शुरू कर दिया. तब प्रदेश की वाम सरकार ने सलीम सेज़ को नंदीग्राम में स्थानानंतरित करने का फैसला किया, जो कि तब लेफ्ट का गढ़ माना जाता था.

लेकिन तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) तब यहां के किसानों को SEZ के लिए होने वाले भूमि अधिग्रहण के खिलाफ एकजुट करने में सफल रही. नतीजतन 2 जनवरी 2007 को जब सांसद लक्ष्मण सेठ ने भूमी अधिग्रहण के लिए पत्र लिखा, तभी स्थानीय किसान और टीएमसी के कार्यकर्ता मिलकर सीपीएम के 250 कार्यकर्ताओं से भिड़ गए. इस हिंसा में छह लोग मारे गए और किसानों ने SEZ के लिए आवंटित क्षेत्र को ब्लॉक कर दिया.

मार्च तक इन किसानों ने किसी भी बाहरी व्यक्ति को नंदीग्राम में प्रवेश नहीं करने दिया, फिर चाहे वो पुलिस हो या कोई सरकारी अधिकारी. 14-मार्च को बुद्धदेव भट्टाचार्य ने 2,500 पुलिस वालों को नंदीग्राम भेजा. कुछ जानकारों का ये भी मानना है कि पुलिस के साथ सीपीएम के संदिग्ध 400 कार्यकर्ता भी नंदीग्राम गए थे.

पुलिस दल और किसानों के बीच झड़प में 14 किसान मारे गए. लेकिन ये आधिकारिक आंकड़ा था. क्योंकि इस झड़प के बाद 100 से ज्यादा किसानों को लापता घोषित कर दिया गया था. इसके बाद नवंबर में भी सरकार की तरफ से ऐसा ही एक और प्रयास किया गया, जिसमें नंदीग्राम पर काबिज़ हो चुके आंदोलनकारी किसानों को पीछे हटना पड़ा.

मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य की तरफ से किसानों की मौतों पर कोई खेद व्यक्त नहीं किया गया, बल्कि उन्होंने ये बयान देकर किसानों को रोष को बढ़ावा देने का काम किया कि- उन्हें (किसान और तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं) को उन्हीं की भाषा में जवाब दिया गया.

ये एक बड़ी घटना थी जिसकी वजह से सूबे में लेफ्ट से लोगों का विश्वास लगातार घटता चला गया. इसका खामियाजा बंगाल की सत्ता पर तीन दशक तक काबिज रही सीपीएम को 2011 के चुनाव में उठाना पड़ा. इस चुनाव के बाद ही ममता बनर्जी पहली बार कांग्रेस के सहयोग से राज्य की मुख्यमंत्री बनी थीं. और इस तरह नंदीग्राम लेफ्ट सरकार का ताबूत बन गया.

इस बार क्या समीकरण बने?

आप को बता दें कि ममता बनर्जी भवानीपोर सीट से दो बार विधायक रह चुकी हैं. 2011 में नंदीग्राम आंदोलन की लहर पर सवार बनर्जी भवानीपोर सीट से 95,000 से अधिक वोटों से जीत दर्ज करने में सफल रहीं. लेकिन 2016 के चुनावों में वे 25,000 वोटों से ही जीत हासिल कर पाई. 

इसके बाद बंगाल की राजनीति पर तृणमूल कांग्रेस की और भवानीपोर सीट पर ममता बनर्जी की पकड़ ढीली पड़ती नजर आई.

इसे इससे समझा जा सकता है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) भवानीपोर के कॉर्पोरेशन वार्ड में बीजेपी से 496 वोट कम हासिल कर पाई थी. इस चुनाव में बीजेपी ने पश्चिम बंगाल की 42 में से 18 सीटों पर भगवा लहराया था.

ऐसे में बंगाल की राजनीति पर करीब से नजर रखने वाले जानकारों का मानना है कि ‘करो या मरो’ की स्थिति वाले इस चुनाव में ममता बनर्जी भवानीपोर से चुनाव लड़कर किसी तरह का ख़तरा मोल नहीं लेना चाहती थीं. ऐसे में उन्हें अपेक्षाकृत एक सुरक्षित सीट की तलाश थी. इसी बीच केंद्र सरकार द्वारा लागू किए गए तीन नए कृषि कानूनों के विरोध में शुरू हुए किसान आंदोलन के बीच उन्हें चुनाव लड़ने के लिए नंदीग्राम सबसे सटीक विकल्प नजर आया.

जानकारों का मानना है कि नंदीग्राम से चुनाव लड़कर ममता बनर्जी न सिर्फ इस सीट पर, बल्कि पूरे पश्चिम बंगाल में 2011 की अपनी किसान हितैषी नेता की छवि को फिर से भुनाना चाहती हैं. लेकिन भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने नंदीग्राम सीट से बनर्जी के पूर्व सहयोगी और क्षेत्र के कद्दावर नेता शुवेंदु अधिकारी को मैदान में उताकर मुकाबले को रोचक बना दिया है.



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