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सचिन पायलट को मंत्रिमंडल विस्तार और राजनीतिक नियुक्तियों में देरी की कसक, कही ये बात

के जे श्रीवत्सन, जयपुर: अपनी ही सरकार को अल्पमत में बताकर बगावत करने के चलते अशोक गहलोत सरकार से बर्खास्त किए गए सचिन पायलट अब भी अपने और अपने समर्थकों की अनदेखी से खासे नाराज हैं. 

नाराजगी इस बात को लेकर है कि अशोक गहलोत को वे आज भी फूटी आंख तक नहीं सुहाते और अब तक उनका साथ देने के लिए बर्खास्त किए गए मंत्रियों की भी न तो मंत्रिमंडल में वापसी हो सकी है और ना ही राजनितिक नियुक्तियों में भी उनके पूरी जगह मिल रही है.

पायलेट खुद तो अब बर्खास्त किये जाने के चलते उपमुख्यमंत्री की बजाय महज टोंक के विधायक बनकर रह गए हैं, बल्कि उनके समर्थक भी आलाकमान से पूरा सम्मान मिलने के आश्वासन के बावजूद भी अब तक भी पूर्व पदनाम को लेकर घूमते फिरते अच्छे दिन की आस की उम्मीद लगाए है. 

अपने समर्थकों की इस अनदेखी को लेकर सचिन पायलेट का यह दर्द मंगलवार को उस वक़्त खुलकर छलक भी आया जब उने इसे लेकर सवाल पूछ लिया गया. सरकार ने दो दिन पहले राजस्थान वित्त आयोग के अध्यक्ष और सदस्यों की घोषणा की तो एक बार फिर से वही चर्चा प्रदेश में शुरू हो गई कि उस कमेटी का क्या हुआ जो सचिन पायलट कैंप के नाराजगी दिखाने के बाद बनाई गई थी. 

इस कमेटी की नियुक्ति इसलिए हुई थी ताकि पायलट समर्थकों को भी फिर से संगठन और सत्ता में उचित भागीदारी दी जा सके. राजस्थान के प्रभारी अजय माकन के वादे के अनुसार इस साल फरवरी में ही राजनितिक नियुक्तियां हो जाने चाहिए थी. 

कुछ एक पदों पर नियुक्तियां हुई भी, लेकिन कहीं भी न तो पायलट का साथ देने वाले नेताओं और ना ही पायलेट खेमे के लोगों को उसमे कोई जगह मिली है. पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट से जब राजनितिक नियुक्तियों और कैबिनेट विस्तार को लेकर जब सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा कि राजनीतिक नियुक्तियां सरकार समय-समय पर करती आई है, लेकिन मेरा मानना है कि सरकार के ढाई साल का कार्यकाल पूरा हो चुका है. 

हमने हमारे घोषणापत्र में जो वादे किए थे उनमें से वादे पूरे भी किये हैं, लेकिन जो वादे पूरे नहीं कर सके हैं और सरकार का जो बचा हुआ कार्यकाल है, उसमें और गति से हमें काम करना होगा. 

इन कामों में पॉलिटिकल अपॉइंटमेंट और मंत्रिमंडल विस्तार भी शामिल है. इन दोनों कामों के लिए पार्टी और सरकार मिलकर आम राय बनाएं. चूंकि खुद सचिन पायलेट उप मुख्यमंत्री थे लेकिन बगावत के चलते उनके साथ- साथ दो और मंत्री रमेश मीना और विश्वेन्द्र सिंह को भी मंत्रिमंडल से बर्खास्त कर दिया गया था. यही नहीं सेवा दल, यूथ कांग्रेस अध्यक्ष को भी बागी बनने के चलते सचिन पायलट के समर्थन के लिए पदों से हटा दिया गया था. 

यानी साफ साफ तो वे नियुक्तियों के ना होने का विरोध तो नहीं कर पाए लेकिन इतना संकेत दे दिया कि बतौर प्रदेश अध्यक्ष उन्होंने जिन वादों के साथ कांग्रेस को राजस्थान में सत्ता में लाने में बड़ी भूमिका निभाई थी, उसे पूरा करने के लिए अब मंत्रिमंडल विस्तार और राजनीतिक नियुक्तियों में देरी पार्टी के लिए उचित नहीं है.  

पायलेट ने तो तो यहां तक कहा दिया कि करीब 9 महीने पहले जो कमेटी बनी थी दुर्भाग्यवश उसमें से अहमद पटेल का स्वर्गवास हो गया और कमेटी का काम आगे नहीं हो सका, लेकिन अब मुझे विश्वास है कि और ज्यादा विलंब कमेटी नहीं करेगी और जो मुद्दे हम लोगों ने उठाए थे और जिन पर आम सहमति बनी थी, उन पर तुरंत प्रभाव से कार्रवाई होगी. 

अशोक गहलोत पर सीधे सीधे विश्वास जताने की बजाय सचिन पायलट ने एक बार फिर कांग्रेस की अध्यक्षा सोनिया गांधी के आदेशों का हवाल ही दिया और कहा की सोनिया जी के कहने पर ही यह कमिटी बनी थी और सोनिया गांधी पर उन्हें पूरा भरोसा है कि जो कमेटी बनी थी, उसके 2 सदस्य अब यह काम पूरा करेंगे. 

अपने समर्थक नेताओं की भी नाराजगी को देखते हुए पायलट को खुलकर यह भी बोलना ही पड़ा कि अब क्योंकि उपचुनाव भी 2 दिन में समाप्त हो जाएंगे और पांच राज्यों के चुनाव भी समाप्त हो चुके हैं. ऐसे में अब उन्हें नहीं लगता कि कोई कारण ऐसा रहना चाहिए कि इस कमेटी के निर्णय और आदेशों के क्रियान्वयन में कोई अधिक विलंब हो. 

वैसे राजस्थान के जिन 3 विधानसभा के लिए उपचुनाव हो रहे हैं, उनमे गुज्जर समुदाय के लोगों की भी अधिकता है, लेकिन सचिन पायलट पार्टी द्वारा स्टार प्रचारक बनाए जाने और गुज्जर नेता होने के बावजूद भी यहाँ पर चुनाव प्रचार के लिए नहीं गए हैं. हालांकि जब नामांकन पर्चे दाखिल करवाए गए थे तब वे जरूर अजय माकन और अशोक गहलोत के साथ थे, लेकिन उसके बाद इस बेरुखी अपना लिया की इन चुनावों के बारे में बात तक नहीं कर रहे.      



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