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कोरोना वैक्सीन लगने के 9 दिन बाद हुई शख्स की मौत पर पीपुल्स मेडिकल कॉलेज ने दिया ये बयान

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नई दिल्ली: भोपाल में कोरोना वैक्सीन लगने के 9 दिन बाद एक शख्स की मौत का मामला सामने आने पर वैक्सीन का निर्माण कर रही भारत बायोटेक का बयान सामने आ चुका है. रविवार को इस मामले में पीपुल्स मेडिकल कॉलेज भोपाल की ओर से डीन अनिल दीक्षित बयान सामने आया है. मीडिया रिलीज में डीन का कहना है कि भारत बायोटेक, आईसीएमआर और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ वायरोलॉजी के संयुक्त तत्वावधान में बनाई गई कोवैक्सीन का फेज 3 ट्रायल देश के विभिन्न भागों में नवंबर माह में प्रारंभ हुआ. 

भोपाल के पीपुल्स हॉस्पिटल, जो कि पीपुल्स कॉलेज ऑफ मेडिकल साइसेंज एवं रिसर्च सेंटर से संबद्ध है, को इस ट्रायल के लिए चयनित किया गया. सेंटर में 27 नवंबर से ट्रायल शुरू किया गया. चूंकि यह एक डबल ब्लाइंड ट्रायल है, इसलिए इसमें पीआई आधे लोगों को वैक्सीन व आधे लोगों को पेल्सिबो लगाया जा रहा है, इसकी दो डोज 28 दिन के अंतराल में दी जा रही हैं. इस ट्रायल में आईसीएमआर एवं भारत बायोटेक द्वारा दिए गए निर्देशों का पालन पूर्ण रूप से किया जा रहा है एवं इस संस्थान द्वारा प्रतिदिन निगरानी रखी जा रही है. 

कोवैक्सीन के फेज 3 के ट्रायल में 12 दिसंबर 2020 को पूरे प्रोटोकॉल के साथ एक वॉलेंटियर को उसकी स्वेच्छा से आईपी का एक डोज दिया गया, इसके बाद लगातार 7 दिन तक उनकी जानकारी ली जाती रही, जिसमें उन्होंने किसी भी प्रकार की तकलीफ का विवरण नहीं दिया. 21 दिसंबर को उनके बेटे ने उनके निधन की जानकारी फोन के माध्यम से सेंटर को प्रदान की. 

मेडिको लीगल इंस्टीट्यूट भोपाल द्वारा किए गए पोस्टमार्टम की रिपोर्ट के अनुसार, मृत्यु का कारण कार्डियोरेस्पिरेटरी फेलियर जो कि सस्पेंडेड पॉइजनिंग के कारण हुआ है, यह बताया गया है कि 9 दिन के बाद इस प्रकार मृत्यु का होना वैक्सीन के संबंधित होने की संभावना नहीं लगती. ब्लाइंडेड ट्रायल होने के कारण भी यह ज्ञात नहीं है कि वॉलेंटियर को वैक्सीन लगाया या फिर प्लेसिबो. 

ड्रग एवं क्लिनिकल ट्रायल के नए नियमों के अनुसार एनडीसीटी रूल्स 2019, किन्हीं भी सीरियस एडवर्स इफेक्ट की रिपोर्ट इंस्टीट्यूट की एथिक्स कमेटी एवं सेंट्रल ड्रग स्टेंडर्ड कंट्रोल ऑर्गेनाइजेशन एवं डाटा मॉनिटिरंग सेफ्टी बोर्ड को देनी होती है, जो प्रावधान के अनुसार दी गई है. जहां तक सीरियस एडवर्स इफेक्ट का प्रश्न है, ये कई हो सकते हैं. 

जिसमें व्यक्ति के अंदर पहले से उपस्थित डिफेक्ट एवं बीमारियां जिनमें कि दुर्घटनाएं भी शामिल की जा सकती हैं, एनडीसीटी के नियमों के अनुसार, इनकी जानकारी भी उपरोक्त संस्थान को देनी होती है. इससे संबंधित पूरी जानकारी विभिन्न संबंधित एजेंसीज को दी जा चुकी है. मृत व्यक्ति के परिवार के साथ पूरी सहानुभूति रखते हुए हम दृढ़ निश्चय के साथ इस ट्रायल को पूरी प्रतिबद्धता के साथ करने के लिए संकल्पित हैं. 

डीन का कहना है कि कोविड 19 स्वास्थ्य आपदा को नियंत्रित करने हेतु किए जा रहे वैक्सीन ट्रायल एक सूचना प्रसार से विपरीत असर होता है एवं इस कार्य में लगे लोग हतोत्साहित होते हैं. 

ये है मामला

45 वर्षीय एक व्यक्ति को यह टीका भोपाल के पीपुल्स मेडिकल कॉलेज में लगाया गया था. कोवैक्सीन भारत बायोटेक और भारतीय आयुर्विज्ञान परिषद (आईसीएमआर) द्वारा बनाई गई स्वदेशी कोरोना वैक्सीन है, जिसका फाइनल ट्रायल बीती 7 जनवरी को पूरा हुआ है. मृतक की पहचान दीपक मरावी के रूप में हुई है. 

उनकी मौत 21 दिसंबर को हो गई थी. दीपक भोपाल के टीला जमालपुरा स्थित सूबेदार कॉलोनी में अपने घर में मृत पाए गए. अगले दिन उनके शव का पोस्टमॉर्टम हुआ था और प्रारंभिक रिपोर्ट में उनके शरीर में जहर मिलने की पुष्टि हुई. मीडिया रिपोर्ट‌्स के अनुसार, मरावी के बेटे का कहना है कि वह मजदूर थे और टीका परीक्षण के लिए एक स्वयंसेवक के रूप में शामिल हुए थे. उन्हें 12 दिसंबर को पहली खुराक दी गई थी. दीपक की पत्नी वैजयंती मरावी का कहना है कि वो इंजेक्शन लगवा कर आए, सात दिन तक ठीक थे और खाना खा रहे थे. 

इसके बाद उन्हें चक्कर आने लगे. मैंने उनसे कहा था कि चलते नहीं बन रहा तो आराम करो. वो खाना थोड़ा-थोड़ा खा रहे थे. 21 को उन्हें उल्टी होने लगी मुंह से झाग निकल रहा था. बेटे का कहना है कि वैक्सीन लगवाने के बाद उनकी सेहत का हाल जानने के लिए अस्पताल से फोन आते रहे. 21 दिसंबर को उनके पिता की निधन की जानकारी लेने पीपुल्स प्रबंधन से तीन बार फोन आया, लेकिन संस्थान से कोई भी नहीं आया. 

राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता दिग्विजय सिंह ने इस घटना पर चिंता जताई है. इस मामले पर वैक्सीन बनाने वाली कंपनी भारत बायोटेक का बयान सामने आया है. भारत बायोटेक का कहना है कि स्वयंसेवक, नामांकन के समय तीसरे चरण के परीक्षण में प्रतिभागी के रूप में स्वीकार किए जाने वाले सभी मानदंडों को पूरा कर चुका था और सभी में स्वस्थ होने की सूचना दी गई थी. 

कंपनी का कहना है कि 7 दिन की खुराक के बाद उन्हें कॉल किए गए और कोई प्रभाव नहीं दिखे. खुराक और प्रारंभिक समीक्षाओं के नौ दिन बाद स्वयंसेवक का निधन हो गया, यह दर्शाता है कि मृत्यु अध्ययन डोजिंग से संबंधित नहीं है. गांधी मेडिकल कॉलेज, भोपाल द्वारा पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार, भोपाल पुलिस को जो साइट मिली है, उसमें मौत का संभावित कारण कार्डियोरसेप्‍पोरेटरी फेल होने और संदिग्ध जहर के कारण है और पुलिस मामले की जांच कर रही है. 



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