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Makar Sankranti 2021 : जानें- क्यों मनाते हैं मकर संक्रांति पर्व और क्या है धार्मिक मान्यताएं

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मदन गुप्ता सपाटू, ज्योतिषाचार्य : आज मकर संक्रांति है. भारत ही नहीं बल्कि दुनियाभर में इस पर्व को मनाया जाता है. सूर्य के मकर राशि में प्रवेश करने पर मौसम में आए परिवर्तन को आज भी रोम में खजूर, अंजीर और शहद बांट कर मनाया जाता है. तिल के महत्व को प्राचीन ग्रीक के लोग भी मानते थे और वर-वधु की संतान वृद्धि हेतु तिल के पकवानों को खिलाते थे.

इस पर्व को देश में हर राज्य में अपने-अपने तरीके से मनाया जाता है. गुजरात व राजस्थान में यह उत्तरायण पर्व है तो उत्तर प्रदेश में खिचड़ी है. तमिलनाडु में पोंगल तो आंध्रा में तीन दिवसीय पर्व है. बंगाल में गंगा सागर का मेला है तो पंजाब में एक दिन पहले लोहड़ी मनाई जाती है. असम में बिहु के नाम से त्योहार मनाया जाता है. पंजाब में एक दिन पहले लोहड़ी का त्योहार मनाया जाता है.

नवग्रहों में सूर्य ही एकमात्र ग्रह है जिसके आस पास सभी ग्रह घूमते हैं. यही प्रकाश देने वाला पुंज है जो धरती के अलावा अन्य ग्रहों पर भी जीवन प्रदान करता है. प्रत्येक वर्ष 14 जनवरी को सूर्य मकर राशि में प्रवेश करता है जिसे सामान्य भाषा में मकर संक्रान्ति कहते हैं. यह पर्व दक्षिणायन के समाप्त होने और उत्तरायण प्रारंभ होने  पर मनाया जाता है. वर्ष में 12 संक्रांतियां आती है. परंतु विशिष्ट कारणों से इसे ही  सर्वाधिक महत्वपूर्ण माना गया है.

मकर संक्रांति को लेकर मान्यताएं

– मकर संक्रांति को लेकर कई कथाएं हैं. सबसे पहली कथा श्रीमद्भागवत एवं देवी पुराण में बताई गई है. इनके अनुसार, शनि महाराज को अपने पिता सूर्यदेव से वैर भाव था क्योंकि सूर्यदेव ने उनकी माता छाया को अपनी दूसरी पत्नी संज्ञा के पुत्र यमराज से भेदभाव करते हुए देख लिया था. इस बात से सूर्य देव ने संज्ञा और उनके पुत्र शनि को अपने से अलग कर दिया था. इससे शनिदेव और उनकी छाया ने सूर्यदेव को कुष्ठ रोग का शाप दे दिया था.

– मान्यता है कि इस दिन भगवान सूर्य अपने पुत्र शनि से मिलने उनके गृह आते हैं. मकर राशि के स्वामी चूंकि शनिदेव हैं, इस लिए भी इसे मकर संक्राति कहा जाता है. 

– भारत में यशोदा जी ने इसी संक्रान्ति पर श्री कृष्ण को पुत्र रुप में प्राप्त करने का व्रत लिया था.

– इसके अलावा यही वह ऐतिहासिक एवं  पौराणिक दिवस है जब गंगा नदी, भगीरथ के पीछे पीछे चलकर कपिल मुनि के आश्रम से होते हुए गंगासागर तक पहुंची थी.

– मान्यता है कि मकर संक्रान्ति पर यज्ञ या पूजापाठ मे अर्पित किए गए द्रव्य को ग्रहण करने के लिए देव व पुण्यात्माएं धरती पर आती हैं.

– महाभारत काल में भीष्म पितामह ने देह त्याग का समय यही चुना था. 

– इस दिन दान करने से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है और इसका फल कई जन्मों तक मिलता है.



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