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Opinion: कोरोना वैक्सीन की बुनियाद पर खड़ी होगी 2021 की कूटनीति !

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विजय शंकर: दुनिया के हर हिस्से में सबसे ज्यादा चिंता इसी बात को लेकर है कि कोरोना की वैक्सीन कैसे मिलेगी? क्या एशिया और अफ्रीका के गरीब देशों को भी उसी तरह से वैक्सीन मिल पाएगी, जैसे अमेरिका और यूरोपीय देशों के नागरिकों को मिल रही है? क्या वैक्सीन के जरिए मोटी कमाई के मौके को दुनिया की बड़ी ताकतें और कंपनियां इंसानियत के लिए छोड़ देंगी? क्या कोरोना की वजह से पासपोर्ट का चरित्र भी बदलेगा या नई शर्तें जुड़ेंगी? कोरोना काल की कूटनीति में भारत की भूमिका क्या होने वाली है?

कोरोना कूटनीति में भारत की भूमिका

भारत के स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन को ग्लोबल अलायंस फॉर वैक्सीन्स एंड इम्युनाइजेशन यानी गावी के बोर्ड का सदस्य चुना गया है. इस संस्था का मकसद दुनिया के गरीब देशों के बच्चों को उन बीमारियों का टीका उपलब्ध करवाना है, जिन्हें वैक्सीन से रोका जा सकता है. गावी दुनियाभर के गरीब देशों के 82 करोड़ से ज्यादा बच्चों की वैक्सीनेशन में मदद कर चुका है. 

ऐसे में तीसरी दुनिया के देशों के गरीब बच्चों तक कोरोना की वैक्सीन पहुंचाने में गावी अहम किरदार निभा सकता है. वैक्सीन के लिए गावी के मंच से तीसरी दुनिया के गरीब देशों की आवाज जोरशोर से उठाने का भारत के पास  शानदार मौका है. अमीर देश कोरोना वैक्सीन पर अपने बौद्धिक संपदा के अधिकार में रत्ती भर समझौता नहीं करना चाहते हैं. 

कोरोना काल में अर्थव्यवस्था को हुए नुकसान की भरपाई कोरोना की वैक्सीन के जरिए करना चाहते हैं. ख़बरों के मुताबिक, यूरोपीयन यूनियन और अमेरिका ने बौद्धिक संपदा अधिकार छोड़ने के प्रस्ताव का विरोध किया है. तीसरी दुनिया के देशों की सोच है कि अगर अमीर देशों का अड़ियल रवैया बना रहा तो इससे कोरोना के खिलाफ लड़ाई मुश्किल हो जाएगी. तर्क दिए जा रहे हैं कि जैसे एड्स के खिलाफ लड़ाई में बड़ी ताकतों ने अपना एकाधिकार छोड़ा, उसी तरह से कोरोना के मामले में भी होना चाहिए.

ग्लोबल लीडर बनने का भारत के पास मौका

भारत भी कोरोना की स्वदेशी वैक्सीन बना रहा है, जिसके इमरजेंसी इस्तेमाल की कभी भी मंजूरी मिल सकती है. भारत की स्वदेशी वैक्सीन का रख-रखाव भी तीसरी दुनिया के देशों के लिए आसान है. भारत में तीन वैक्सीन पर तूफानी रफ्तार से काम जारी है. ऐसे में तीसरी दुनिया के देशों को अपनी वैक्सीन देकर भारत उनके दिलों में गहराई तक जगह बना सकता है.

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दौर में अमेरिका की उस छवि पर बट्टा लगा है, जो दुनिया की बड़ी-बड़ी मुसीबतों से लड़ने में ग्लोबल लीडर की हुआ करती थी. अंदरुनी चुनौतियों से जूझते रूस पर तीसरी दुनिया के देश आंख बंद कर भरोसा नहीं कर सकते. चीन के वुहान से दुनियाभर में फैले कोरोना वायरस और राष्ट्रपति शी जिनपिंग की विस्तारवादी नीति ने उन्हें दुनिया का खलनायक बना दिया है. 

जिनपिंग की कर्ज कूटनीति से त्राहिमाम कह रहे एशिया और अफ्रीका के देश भी चीन से छुटकारा चाहते हैं. चीन ने भी कोरोना की वैक्सीन तैयार की है, जिसे शक की नजरों से देखा जा रहा है. चीन अपनी वैक्सीन के जरिए मोटी कमाई के लिए कूटनीतिक दांव-पेंच आजमा रहा है. ऐसे में भारत के पास कोरोना कूटनीति के जरिए तीसरी दुनिया के देशों की अगुवाई का बड़ा मौका सामने हैं .

वैक्सीन पासपोर्ट हो सकता है जरुरी

सालभर पहले कोरोना वायरस बगैर वीजा-पासपोर्ट के ही पूरी दुनिया में फैल गया. किलर कोरोना ने ऐसा कोहराम मचाया कि पूरी दुनिया घुटने पर आ गयी. लेकिन, 2020 की विदाई तक अच्छी ख़बरें आने लगीं. कोरोना की रफ्तार न सिर्फ धीमी हुई बल्कि अमेरिका, कनाडा, यूरोप और पश्चिमी एशिया के कुछ देशों में मंट वैक्सीनेशन का काम शुरू हो गया.

दुनिया में इस महामारी का खतरा तब तक रहेगा, जब तक एक भी कोरोना संक्रमित बचा रह जाता है. ऐसे में मास्क और सोशल डिस्टेंसिंग के नियमों की तरह ही नए साल में वैक्सीन पासपोर्ट यानी डिजिटल हेल्थ पास उसी तरह जरुरी हो सकते हैं, जैसे किसी भी देश में दाखिल होने के लिए वीजा और पासपोर्ट होते हैं. विदेश यात्रा के दौरान कदम-कदम पर कोविड स्टेटस दिखाना अनिवार्य किया जा सकता है.

कोरोना महामारी से दुनियाभर में 18 लाख लोगों की मौत हो चुकी है. दुनिया की बड़ी ताकतों ने अपने नागरिकों के वैक्सीनेशन की प्रक्रिया शुरू कर दी है. दुनिया के धनी देश सबसे पहले अपने मुल्क के लोगों के लिए वैक्सीन की डोज सुरक्षित कर लेना चाहते हैं, जिसे वैक्सीन राष्ट्रवाद कहा जा रहा है. कोरोना की वैक्सीन बना कर खुद को सर्वश्रेष्ठ साबित करने की होड़ जारी है.

अपनी वैक्सीन को सर्वश्रेष्ठ बताने में कोई पीछे नहीं है, लेकिन बड़ा सवाल यही है कि क्या दुनिया की बड़ी ताकतें गरीब देशों के नागरिकों को वैक्सीन मुहैया करवाने में अपना दिल दिखाएंगी ? क्या वैक्सीन की दुनिया के शक्तिमान कोरोना के खिलाफ जंग में मुनाफे को छोड़ कर सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया की भावना से आगे बढ़ने की हिम्मत दिखाएंगें?

( लेखक News 24 के डिप्टी एग्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर हैं और ये उनके निजी विचार हैं )



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