प्रधानमंत्री जी हम भारतीय सेना के जवानों को वर्दी और जूते नहीं दे सकते!

हाल ही में किसी ने कहा कि सेना अपनी जरूरतों के लिए पेंशन के फंड का इस्तेमाल कर रही है तो हैरानी हुई थी मगर यह नहीं सोचा कि बात यहां तक पहुंची है कि हम जवानों को वर्दी और जूते नहीं दे सकते. 

भारतीय सेना की हालात इतनी खराब हो गई है कि अब जवानों को खुद ही अपनी वर्दी, बेल्ट, जूते जैसे जरूरी समान खरीदने होंगे. इकोनॉमिक टाइम्स में छपी ख़बर के मुताबिक भारतीय सेना ने सरकारी ऑर्डेनंस फैक्ट्रियों से अपनी खरीदारी में भारी कटौती का फैसला किया है. 

इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट में कहा गया है कि ये फैसला छोटे युद्धों की स्थिति में फौरी के तौर पर अहम गोलाबारूद खरीदने के लिए पैसा बचाने के लिए किया गया है. 

रिपोर्ट के मुताबिक आर्डनंस फैक्ट्रीज से सप्लाई होने वाले प्रॉडक्ट्स को 94 फीसदी से कम करके 50 फीसदी पर लाया जाएगा. सेना को ये कदम इसलिए उठाना पड़ रहा है क्योंकि केंद्र ने गोलाबारूद की आपातकालीन खरीदारी के लिए अतिरिक्त फंड नहीं दिया है.

सेना को लघु युद्ध की जरूरतों को पूरा करने के लिए कई हजार करोड़ की जरूरत है तो केंद्र सरकार नहीं दे रही है. नतीजा सेना को अपने बजट में कठोर कटौती के लिए मजबूर होना पड़ रंहा है. 

2017 की कंट्रोलर जनरल ऑफ डिफेंस अकाउंट की रिपोर्ट का भी नहीं हुआ असर

न्यूज़ 18 इंडिया के मुताबिक फरवरी 2017 में रक्षा मंत्रालय के तहत आने वाले कंट्रोलर जनरल ऑफ डिफेंस अकाउंट ने अपनी रिपोर्ट में चौंकाने वाला खुलासा किया था कि सेना के जवानों को अपने पैसे खर्च करके कपड़े और दूसरे जरूरी सामान खरीदने पड़ रहे हैं क्योंकि सेना को वर्दी मुहैया कराने वाली फैक्ट्री अपना लक्ष्य ही पूरा नहीं कर पा रही है.

देश का जवान जो दिन रात देश की रक्षा के लिए तैनात रहता उसकी आज ये हालात हो गई है. 2017 की इस रिपोर्ट में ये भी कहा गया था कि जवानों को पुराने कपड़े पहनने पर मजबूर होना भी पड़ रहा है.  उस वक्त डिफेंस एक्सपर्ट मेजर जनरल पी.के सहगल ने इस रिपोर्ट को बिल्कुल सही ठहराया था. 

भारतीय सेना की जरूरतें कब पूरी होगी?

दरअसल सरकारी आर्डिनेंस फैक्टरी रेगिस्तानी इलाकों से लेकर पहाड़ों और घने जंगलों में ऑपरेट करने वाली 13 लाख भारतीय सेना की कपड़े की जरूरतों को कभी भी पूरा नही कर पाई है. इस रिपोर्ट के मुताबिक सेना को जरूरी सामान मुहैया कराने वाली ऑर्डिनेंस फैक्ट्री 2013 से लेकर 2015 के बीच जरूरत और मांग के मुताबिक सामानों की सप्लाई नहीं कर पाई. रिपोर्ट में इसकी वजहें भी गिनाई गई थी.

इसमें सीमित उत्पादन क्षमता, संसाधनों का पूरा इस्तेमाल ना हो पाना और खराब पड़ी मशीनों को ऑर्डिनेंस फैक्ट्री जरूरतें पूरी ना कर पाने की वजह बताया गया था. इस रिपोर्ट में हर साल वर्दी से जुड़े सामानों की जरूरत, मांग और उसकी आपूर्ति का पूरा ब्यौरा दिया गया था. इसके बाद भी मोदी सरकार ने कोई फैसला नहीं लिया.

ऑर्डिनेंस फैक्ट्री क्यों लक्ष्य पूरा नहीं कर पाती हैं?

2017 की रिपोर्ट के मुताबिक ऑर्डिनेंस फैक्ट्री ने 2015-16 में 4 लाख 76 हजार कंबल मुहैया कराने का लक्ष्य रखा था, लेकिन 2015 के आखिर तक सिर्फ 2 लाख 99 हजार कंबल ही मिल पाए. जिसके बाद ऑर्डिनेंस फैक्ट्री ने 2017 में सवा 5 लाख कंबल बनाने का लक्ष्य रखा था. जो पूरा नहीं कर पाई.

सेना के जवानों के लिए हर साल 3 लाख 46 हजार कंबल की जरूरत होती है. जाहिर है ऑर्डिनेंस फैक्ट्री का लक्ष्य तो बड़ा है, लेकिन कभी भी वो अपने लक्ष्य तक पहुंच नहीं पाती.

ऐसे ही जूतों का लक्ष्य भी कभी पूरा नहीं हुआ है. 2015-16 में 3 लाख हाई एंकल बूट बनाने का लक्ष्य था लेकिन सेना के जवानों को 1 लाख 91 हजार जूते ही मिल पाए. दिसंबर 2015 तक जवानों तक 5 लाख 61 हजार जोड़ी जुराबें पहुंचाई गईं जबकि जरूरत 10 लाख 19 हजार जोड़ी जुराबों की थी. यहां पर आपको बता दें कि सेना के जवानों को मिलने वाली जुराबें सात महीने ही चलती हैं.

वहीं ठंड से बचने के लिए कोट और ऊनी जर्सी का भी बुरा हाल है. 2015-16 में  ऑर्डिनेंस फैक्ट्री ने सेना को 4 लाख 97 हजार जर्सी देने का वादा किया था लेकिन दिसंबर 2015 तक सिर्फ 2 लाख 67 हजार जर्सी मिली. इसी तरह 3 लाख 85 लाख कोट सप्लाई करने का वादा कर केवल 2 लाख 38 हजार कोट मुहैया कराए गए.

सेना को इतना महंगा क्यो बेचा जाता है सामान?

फरवरी 2017 की कंट्रोलर जनरल ऑफ डिफेंस अकाउंट की रिपोर्ट बताती है कि ऑर्डिनेंस फैक्ट्री बाजार के मुकाबले काफी ऊंची कीमत पर सेना को सामान बेचती है. यहां भी भ्रष्टाचार पूरी तरह लिप्त है.

मोदी सरकार आने के बाद भी सेना के जवानों को मिलने वाली वर्दी और दूसरे सामान की क़ीमत तय नहीं की गई. लिहाजा डायरेक्टर जनरल ऑर्डिनेंस फैक्ट्री से निकले साजो- सामान बाजार में मिलने वाले उसी सामान से ज्यादा महंगे होते हैं. 

सामान पहुंचाने की लंबी प्रकिया क्यों?

सेना को वर्दी से लेकर सभी साजों सामान पहुंचाने की प्रकिया काफी मुश्किल भरी है. वेंडर को फाइनल सप्लाई देने से पहले की प्रकिया 36 स्तर से होकर गुजरती है जिसमें 313 से ज्यादा का वक्त लग जाता है. 

क़ीमतो में इतना अंतर क्यों?

क्या आपको पता कि ऑर्डिनंस फैक्ट्री जवानों से सामान का दुगना वसूलती है. दरअसल ऊनी जर्सी यहां जवानों को 1900 रुपये की मिलती है जो बाज़ार में आसानी से 700 रुपये की मिल जाती है. वहीं सेना को जो जूते मिलते हैं उनकी क़ीमत 2900 रुपये है जबकि बाज़ार में 1100 रुपये के आसानी से मिल जाते है. 

विज्ञापनों पर करोड़ो पैसे बहाने वाली बीजेपी सरकार के पास भी क्या सेना के लिए वर्दी का बजट नहीं है? इस ख़बर पर यकीन नहीं होता कि सेना को खुद वर्दी खरीदनी पड़ रही है. जो सेना देश की आन-बान-शान के लिए कुछ भी करने को तैयार है उस देश की सरकार उन्हें उनकी पहचान वर्दी तक नहीं दे रही है. 

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