फेक्ट: लोगों की जेव में आग लगा कर खुद अपनी जेब भर रही मोदी सरकार!

नई दिल्ली: पेट्रोल-डीजल की क़ीमतों ने एक बार फिर लोगों को सड़कों पर ला दिया है. बढ़ती ईंधन की क़ीमतों के खिलाफ देशभर में प्रदर्शन तेज हो गए है. इससे पहले ऐसा यूपीए की सरकार में बीजेपी ने सड़कों पर उतर प्रदर्शन किया था. लेकिन अब भी बीजेपी वाले इसे 4 सालों में 90 पैसे/प्रति साल की बढ़ोतरी ही बता रहे हैं.

पूर्व वित्त मंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी चिदंबरम का दावा है कि केंद्र सरकार चाहती तो पेट्रोल के दाम 25 रुपए प्रति लीटर तक कम कर सकती थी अगर ये क्रूड ऑयल की कम कीमतों का लाभ आम आदमी को देना चाहे तो. लेकिन ये सरकार अपना मुनाफ़ा देखना चाहती है.

बीजेपी समर्थकों ने इस पर पलटवार में कहा कि असल में ये यूपीए सरकार थी, जिसने अपने दस साल के कार्यकाल में पेट्रोल-डीजल की क़ीमतों से लोगों की जेब में आग लगाई. सोशल मीडिया पर तस्वीर फैलाई जा रही है जिसमें यूपीए और बीजेपी की सरकारों के रहते पेट्रोल की कीमतों में बढ़ोतरी की तुलना दिखाई गई है. 

बीजेपी आईटी सेल के प्रमुख अमित मालवीय ने ग्राफिक्स के साथ संदेश को ट्वीट किया.ये ट्वीट में लिखा गया है कि ‘असुविधाजनक तथ्य’-  2014-18 के बीच पेट्रोल के दाम हर साल 90 पैसे ही बढ़े. जबकि यूपीए के 10 साल के कार्यकाल में पेट्रोल हर साल औसतन 4 रुपए बढ़े. इस संदेश को बीजेपी वाले धड़ले से वायरल कर रहे है. 

इस मैसज को देख कर सभी कह सकते हैं कि ये दावा बिल्कुल सही है. लेकिन इसके फेक्ट और गहराई से विश्लेषण किया जाए तो ये दावा ना सिर्फ भ्रामक है बल्कि आधा ही सच है. पेट्रोल की क़ीमतें अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग होती हैं लेकिन बीजेपी के संदेश में पेट्रोल की क़ीमतें देते हुए किसी शहर का जिक्र नहीं किया गया है. 

चलिए एक ही शहर के साथ इस डेटा की तुलाना करते है. तुलना के लिए देश की राजधानी को चुन लेते है.  दिल्ली में पिछले 14 साल में पट्रोल की क़ीमतों के उतार-चढ़ाव के फेक्ट चेक किए गए. पेट्रोलियम मंत्रालय से जुड़े पेट्रोलियम प्लानिंग एंड एनालिसिस सेल से कच्चे तेल की क़ीमतें और पेट्रोल की रिटेल कीमतों का पहले डेटा देख लीजिए. 

मई 2004 में यूपीए 1 जब सत्ता में आया और मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने तो दिल्ली में पेट्रोल की क़ीमत 33.71 रुपये प्रति लीटर थी. वहीं नरेंद्र मोदी ने मई 2014 में जब सत्ता संभाली तो पेट्रोल दिल्ली में 71.41 रुपये प्रति लीटर बिक रहा था. यानी पेट्रोल की क़ीमत दस साल के अंतराल में तब 38 रुपये बढ़ चुकी थी. इसका मतलब यूपीए के कार्यकाल में पेट्रोल की क़ीमत हर साल औसतन 3.80 रुपए प्रति लीटर बढ़ी. यहां तक तो अमित मालवीय का दावा सही है.

लेकिन पेट्रोल की रिटेल कीमतों को अलग करके देखना जरूरी है क्योंकि पेट्रोल-डीजल की क़ीमतें तय करने में दो चीज़ें अहम होती हैं- कच्चे तेल की क़ीमतें और केंद्र और राज्य सरकारों के टैक्स. अगर टैक्स को ना बदला जाए तो पेट्रोल और डीजल की कीमतें सीधे सीधे कच्चे तेल की क़ीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव की तरह ही ऊपर-नीचे होंगी.

दरअसल पेट्रोल की रिटेल क़ीमतों का सही आकलन तभी किया जा सकता है जब उस वक्त की कच्चे तेल की क़ीमतों को भी ध्यान में रखा जाए. 

देखते हैं बीते 14 सालों में कच्चे तेल की क्या-क्या क़ीमतें रही.

रिसर्च से पता चलता है कि बीते 14 साल में कच्चे तेल की क़ीमतें 2004 में सबसे कम थीं जब यूपीए सत्ता में आया था लेकिन यूपीए 2 के कार्यकाल में ये 112 डॉलर प्रति बैरल के ऊंचे स्तर पर भी गया. यहां पूरे साल की औसत क़ीमत की बात की जा रही है. जब कच्चे तेल की क़ीमत 112 डॉलर प्रति बैरल के ऊंचे स्तर तक भी गई तो भी पेट्रोल की रिटेल कीमत 65.76 रुपये प्रति लीटर ही रही.

पेट्रोल क़ीमत अब 77 रुपये के सबसे ऊंचे स्तर को छू रही है जब कच्चे तेल की क़ीमत 86 डॉलर प्रति बैरल के आसपास चल रही है. ये अब भी कच्चे की औसतन सबसे ज्यादा क़ीमत 112 डॉलर से 25 फीसदी कम है. कच्चे तेल की सबसे ज्यादा क़ीमत का मनमोहन सिंह सरकार को 2011-12 में सामना करना पड़ा था.

कच्चे तेल की क़ीमतें मोदी सरकार का कार्यकाल शुरू होने के बाद नीचे गिरना शुरू हो गई थी. 2015-16 में ये 46 डॉलर प्रति बैरल के स्तर तक नीचे आ गई थी. लेकिन मोदी सरकार ने पेट्रोल की रिटेल क़ीमतों को समान स्तर पर बनाए रखने का फैसला किया. इसके लिए पेट्रोल पर केंद्रीय उत्पाद शुल्क लगातार बढ़ाया जाता रहा. 9.48 रुपए प्रति लीटर से ये बढ़कर जनवरी 2016 में 21.48 रुपये प्रति लीटर के सर्वोच्च स्तर तक पहुंच गया. जब कच्चे तेल की क़ीमतों ने फिर बढ़ना शुरू किया तो उत्पाद शुल्क को 4 अक्टूबर 2017 को दो रुपये प्रति लीटर घटा दिया गया. तब से ये 19.48 रुपये प्रति लीटर के स्तर पर बना हुआ है.

 

कच्चे तेल की क़ीमतें(2004-218)
साल क़ीमतें $
2004 $36
2005 $50
2006 $61
2007 $69
2008 $94
2009 $60
2010 $77
2011 $107
2013 $109
2012 $105
2014 $96
2015 $49
2016 $40
2017 $52
2018 $64

यूपीए 2 कार्यकाल खत्म होने के बाद बीते चार साल की बात की जाए तो पेट्रोल में उत्पाद शुल्क 126 फीसदी  और डीजल पर 330 फीसदी बढ़ा है. हालांकि पेट्रोल पर टैक्स लगाकर कमाई करने के मामले में राज्य सरकारें भी केंद्र सरकार से पीछे बिल्कुल नहीं रहीं. दिल्ली की बात करे तो हालत ये है कि मार्च 2010 में जो वैट 12.5 फीसदी था वो अब बढ़ता-बढ़ता 27 फीसदी तक पहुंच चुका है. दिल्ली तो उन राज्यों में शुमार है, जो सिर्फ पेट्रोल पर ही वैट नहीं वसूलते बल्कि डीलर को मिलने वाले कमीशन पर भी अलग से वैट लगाकर कमाई करता हैं.

 ऐसे में जो कोई भी आपसे ये कहता है कि बीते चार साल में पेट्रोल की क़ीमतें 90 पैसे प्रति वर्ष की दर से बढ़ी हैं तो वो आपको अर्धसत्य ही बताता है. असुविधाजनक तथ्य ये है कि अगर मोदी सरकार ने सत्ता में आने के बाद केंद्रीय उत्पाद शुल्क को ज्यादा ना बदला होता तो क्रूड ऑयल की मौजूदा कीमतों के हिसाब से दिल्ली में अब भी पेट्रोल के लिए लोगों को जेब से 65 रुपए प्रति लीटर ही ढीले करने पड़ते.

 

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