क्या कर्नाटक के राज्यपाल को भी थप्पड़ मारना चाहिए?

कर्नाटक विधानसभा चुनाव के नतीजों ने लोगों के लिए असमंजस पैदा कर दिया है. खासकर तीनों पार्टियों के लिए. एक तरफ जहां बीजेपी सरकार बनाने जा रही है वहीं कांग्रेस-जेडीएस भी प्रदेश की सत्ता की कमान संभालने जा रही है मानो.  वैसे राज्यापाल की और से बीजेपी को सरकार बनाने का ऑफर किस ढंग से सही है वो राज्यपाल ही जानते है. क्योंकि प्रदेश में बीजेपी नंबर वन पार्टी जरूर है लेकिन इसका मतलब ये नहीं उसके पास बहुमत है. जब जेडीएस-कांग्रेस विधायक दल के नेता कुमारस्वामी ने 117 विधायकों के हस्ताक्षर वाला नोट राज्यपाल को सौंप दिया तो फिर उस हिसाब से तो कुमारस्वामी को सरकार बनाने को कहना चाहिए था. बीजेपी के पास सिर्फ 104 विधायक बाकि 8 विधायक कहां से आएंगे?

कर्नाटक विधानसभा चुनाव-2018
पार्टी सीटें-222/224 2013 के नतीजे
बीजेपी 104 40
कांग्रेस 76 122
जेडीएस 38 40
अन्य 02 22

राज्यपाल का ये फैसला क्या सच में सही है. क्योंकि ऐसे में अगर बीजेपी उन विधायकों को अपनी और करेगी तो कैसे करेगी? और वो 8 विधायक अगर बीजेपी को ही समर्थन करना चाहते है तो चुनाव से पहले भी तो बीजेपी में आ सकते थे. चलो चुनाव से पहले जीतने का भरोसा ना रहा होगा लेकिन जीत के साथ ही बीजेपी को समर्थन दे सकते थे. पर ऐसा नहीं हुआ. कांग्रेस और जेडीएस के विधायकों ने एकता दिखाई और सरकार बनाने का फैसला किया. पर राज्यपाल ने यहां फिर पेच अड़ा दिया. यहां सरकार का न्यौता ही बीजेपी को मिल गया.

अब क्या जब येदियुरप्पा शपथ ले लेंगे और उनको बहुमत साबित करना होगा तो कांग्रेस या जेएडीएस के वो 8 विधायक बिना शर्त बीजेपी में चले जाएंगे. लगता तो नहीं है. क्योंकि उन्हें बस में करने के लिए बीजेपी को खरीद फिरोख्त की जरूरत पड़ेगी. यानी राज्यपाल के इस फैसले ने भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने का काम किया है. वैसे भी कुमारस्वामी बीजेपी पर आरोप लगा चुके है कि उनके कुछ विधायकों को बीजेपी ने 100 करोड़ में खरीदने की कोशिश की है.

वैसे राज्यपाल के इस फैसले में भारत के उप-प्रधानमंत्री और ताऊ चौधरी देवीलाल के उस थप्पड़ की याद ताज़ा कर दी है जब 1982 में हरियाणा विधानसभा में ऐसे स्थिति पैदा हुई थी. वैसे पिछले साल गोवा चुनाव में भी राज्यपाल ने बीजेपी को सरकार बनाने का न्यौता देकर ताऊ की याद ताज़ा कर दी थी. अब फिर कर्नाटक विधानसभा ने वहीं याद ताज़ा कर दी है. 

दरअसल 1982 में हरियाणा में उस समय सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस को बहुमत नहीं होते हुए भी राज्यपाल जीडी तपासे ने पार्टी नेता चौधरी भजनलाल को शपथ दिला दी थी. तब लोकदल के नेता चौधरी देवीलाल इतना नाराज हुए कि उन्होंने तपासे को थप्पड़ जड़ दिया और प्रदेश में एक नई क्रांति की शुरुआत कर दी.  लेकिन इसके बाद भी उस समय कांग्रेग के दिग्गज नेता भजनलाल ने ताऊ से मात नहीं खाई और खरीद-फ़रोख्त का ऐसा खेल खेला की आज भी लोगों को याद है.

हरियाणा की 90 सीटों वाली विधानसभा में भी ऐसा ही हुआ. उस समय भी त्रिशंकु विधानसभा अस्तित्व में आई. कांग्रेस  को 35 सीटें मिलीं और लोकदल को 31 सीटें मिली. उस समय लोकदल का बीजेपी से गठबंधन था तो 6 सीटें उनकी थी. राज्य में सरकार बनाने की दावेदारी दोनों ही दलों ने रख दी. जब ताऊ देवीलाल राज्यपाल को सरकार बनाने की दावेदारी रख कर लौट ही रहे थे कि राज्यपाल ने भजनलाल को उनके मंत्रियों के साथ मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी. 

हरियाणा विधानसभा चुनाव-1982
पार्टी सीटें-90/90
बीजेपी 06
कांग्रेस 36
लोकदल 31
जेएनपी 01
अन्य 16
कुल 90/90

जैसे ही ताऊ देवीलाल को इस बात का पता चला वे अपने विधायकों को लेकर राजभवन पहुंचे और अपने विधायकों की परेड करवाई. लेकिन राज्यपाल ने देवीलाल की एक ना सुनी.  जिसके बाद ताऊ देवीवाल को राज्यपाल के आचरण पर काफी गुस्सा आया. उस समय ताऊ के साथ बीजेपी के नेता डॉ. मंगलसेन भी मौजूद थे.  देवीलाल और राज्यपाल तपासे के बीच उस समय बहुत तीखी बहस हुई. आक्रामक देवीलाल के सामने तपासे सिर्फ मिमिया दिखे.

उन दिनों केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी और भजनलाल हरियाणा के एक युवा नेता थे. तब तपासे पर केंद्र का काफी दबाव था. कहा जाता है कि देवीलाल ने तपासे की ठुड्डी पकड़कर उन्हें खरी-खोटी सुनाई. ताऊ ने तो तपासे को  इंदिरा गांधी का चमचा तक कह दिया था. तपासे ने ताऊ देवीलाल का हाथ झटका तो चौधरी देवीलाल ने तपासे को एक जोरदार थप्पड़ जड़ दिया,  जिसकी गूंज दिल्ली तक हुई और पूरे देश में ये बात आग की तरह फैल गई. लेकिन देवीलाल बीजेपी और जगजीवन राम कांग्रेस के विधायकों और कुछ निर्दलीयों को साथ लेकर अपना बहुमत दिखाते रहे. उधर भजनलाल ने शपथ लेकर अपना बहुमत साबित कर दिया. उस समय ही ‘होर्सट्रेडिंग’ जैसे शब्द उछले और राजनीति में स्थापित हो गए. भजनलाल इस राजनीतिक अपसंस्कृति के राष्ट्रीय प्रतीक माने जाते हैं.

अब हालात बदल गए है. पहले ये सब कांग्रेस छल-कपट की राजनीति कर रही थी वो बीजेपी करने लगी है.  गोवा में बीजेपी ने इसका उदहारण पेश किया. गोवा में बीजेपी को हालांकि सबसे बड़ी पार्टी बीजेपी नहीं थी फिर भी वहां राज्यपाल ने बीजेपी को सरकार का न्यौता दिया. 

गोवा विधानसभा चुनाव-2017
पार्टी सीटें-40/40
कांग्रेस 17
बीजेपी 13
अन्य 10

गोवा के हिसाब से देखें तो कर्नाटक में राज्यपाल को जेडीएस और कांग्रेस को सरकार बनाने का न्यौता देना चाहिए. पर केंद्र का दाबाव ही कहेंगे कि अब गेंद बीजेपी के पाले में है. ऐसे में क्या अब कर्नाटक के राज्यपाल को भी थप्पड़ पड़ना चाहिए? क्योंकि यहां सत्ता के लिए सब कुछ किया जा रहा है.

 

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